Rehan School Made Me a New Person | Saima’s Transformation Story | EP - 162 | #rehanallahwala
Rehan School Made Me a New Person | Saima’s Transformation Story | EP - 162 | #rehanallahwala Can one year really change a person’s entire life? In this powerful episode, Saima shares her honest journey from being a traditional teacher with limited confidence to becoming a dig…
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Hindiजैसे अभी बोल रही हूं कॉन्फिडेंस से मुझ में बहुत ज्यादा कमी थी इस चीज की। हालांकि आप टीचर थी। हालांकि मैं टीचर थी तो हम लोगों ने चिल्लाना होता था। वहां पे बोलना नहीं होता था। मारधाड़ बच्चों के साथ प्यार से बात नहीं। मुझे नहीं पता था कि बच्चे लैपटॉप पर काम कर रहे हैं। मुझे नहीं पता था कि बच्चों के मोबाइल पे काम हो रहा है। और फिर मैं पूरे रास्ते जाते हुए सोचती गई कि नहीं कल से मैंने नहीं आना मुझसे नहीं होगा। मैं नहीं कर सकती। मतलब Facebook भी मेरे पास Facebook भी नहीं थी। मैंने कोई डाउनलोड नहीं की हुई थी। तो उसने कहा हाला आप कोई गलत काम करने तो नहीं ना आ रही ना कोई डांस तो नहीं करना कोई गाना तो नहीं गाना जी बिस्मिल्लाह रहमा रहीम आज मैं रिहान स्कूल इस्लामाबाद पाराकू कैंपस में हूं मेरे साथ मिस साइमा हैं और ये यहां पर फैसिलिटेटर हैं तकरीबन एक साल से और उससे पहले भी स्कूलों में काम किया है इन्होंने तो बहुत-बहुत शुक्रिया पहले तो मैं आपका शुक्रिया इसलिए करना चाहता हूं कि मैंने आज आपकी परफॉर्मेंस देखी है ओवरऑल आप माशा्लाह बहुत स्ट्रिक्ट और विद मोहब्बत बच्चों से आप बातें करती हैं। अल्लाह आपको खुश रखे। पहले मैं आपसे डरा हुआ था कि यार यह बहुत ही ज्यादा स्ट्रिक्ट है। लेकिन आज देखा तो नहीं उसमें साथ मोहब्बत भी शामिल होती है बच्चों के लिए। थैंक यू। तो मैं चाहूंगा जानना कि पिछले एक साल में आपने क्या देखा ये स्कूल किस काम के लिए है? क्या पर्पस क्या समझ आया? क्या अच्छा है? क्या बुरा है? अस्सलाम वालेकुम। मेरा नाम साइमा हैप्पीनेस वाली है। और मैं रिहान स्कूल इस्लामाबाद कैंपस में एज अ फैसिलिटेटर काम कर रही हूं। अ सर आपने जैसे मुझसे ये जो क्वेश्चन किया है ये स्टार्ट में जब मैं आई थी तो शायद इसका जवाब भी ना दे पाती क्योंकि मेरे बोलने की जैसे अभी बोल रही हूं कॉन्फिडेंस से मुझ में बहुत ज्यादा कमी थी इस चीज की। हालांकि आप टीचर थी। हालांकि मैं टीचर थी क्योंकि जो मैं जिस स्कूल से आई थी जैसे ट्रेडिशनल स्कूल से वहां पे तो हम लोगों ने चिल्लाना होता था। वहां पे बोलना नहीं होता था। मारधाड़ बच्चों के साथ प्यार से बात नहीं। और उसके बाद फिर मैं एक ऐसे स्कूल में गई हूं जहां पर प्यार से भी बात करते थे। मारने की भी इजाजत नहीं थी। यहां पर जब मैं फर्स्ट टाइम आई हूं तो मुझे नहीं पता था कि इसके अंदर क्या है। मुझे नहीं पता था कि बच्चे लैपटॉप पे काम कर रहे हैं। मुझे नहीं पता था कि बच्चों के मोबाइल पे काम हो रहा है। मैं आम ट्रेडिशनल स्कूल समझ के यहां पे आई थी। जब फर्स्ट डे था मेरा मैं अंदर आके बैठी। तो सबसे पहले तो मुझे हैरत हुई कि ये बच्चे ये क्या है? ना कोई बुक है और ना ही कोई टीचर आ रहा है जो डांट टपट करे या कुछ भी सब बच्चे बैठे हुए अपने काम में लगे हुए हैं और सब लैपटॉप पे काम कर रहे हैं। ये चीज मुझे बड़ी अजीब लगी थी और फिर मैंने क्योंकि मुझे क्रिएट क्रिएटिविटी का बहुत शौक है और मुझे भी था कि मैं जब मेरी मतलब मेरे घर में भी थी मेरी अपनी भांजियां थी। वो कार्ड्स वगैरह डिजाइन करती थी तो मुझे बड़ा होता था कि मुझे भी आनी चाहिए ये चीज। हालांकि मुझे नहीं आती थी। फिर मैं यहां पे आई जब तो बच्चों को कैनवा पोस्ट बनाना देखा तो फर्स्ट डे तो मैं बहुत डर गई थी कि ये इतना मुश्किल काम है मैं नहीं कर सकती मुझसे नहीं होगा और फिर मैं पूरे रास्ते जाते हुए सोचती गई कि नहीं कल से मैंने नहीं आना मुझसे नहीं होगा मैं नहीं कर सकती बहुत मुश्किल है मैं फिर मैं जब दूसरे दूसरा दिन था तो फिर मैं आ गई फिर क्यों आई है मुझे नहीं पता लेकिन मैं आ गई आके फिर मैं फिर बैठी। फिर मैंने खुद से किया कि बच्चों से मैंने कहा कि आप जो बना रहे हो मुझे भी सिखाओ। फिर उन्होंने मुझे सिखाना शुरू किया। कैनवा पोस्ट जब उन्होंने बनाना सिखाई तो मैं काफी देर सोचती रही कि इसने क्या किया, क्या किया, कैसे किया, कहां से लिया। मैं घर जाते हुए फिर वही दूसरा दिन था कि मैं यही सोच रही थी कि अब मैं कॉपी लाऊंगी। कॉपी पे लिखा करूंगी कि यह भी करना है, ऐसे करना है, ऐसे करना है, ऐसे करना है, ऐसे करना है। और फिर शायद मुझे समझ आ जाए। फिर मुझे वो याद ध्यान नहीं रहेगी और मैं घर जाके उसी को रिपीट करूंगी तो मुझे आ जाएगा। तीसरी बात यह है कि मेरे पास लैपटॉप नहीं था। लैपटॉप में काम ऑलरेडी मैं कर चुकी थी लेकिन बहुत ज्यादा नहीं आता था क्योंकि डाटा एंट्री और ये चीजें तो आम होती हैं पेपर्स बनाना या कुछ भी। तो मुझे बड़ा अजीब लगा। अब मुझे यह था कि जाहिर है मेरे पास तो लैपटॉप ही होना चाहिए। वो भी मेरे लिए बहुत मुश्किल था क्योंकि मैं बाय नहीं कर सकती थी। फिर मैं यहां पर आई और जब मैंने कैनवा पोस्ट बनाना सीखी और फर्स्ट टाइम जब मैंने cवा पोस्ट बनाई और वो मैंने अपलोड नहीं की थी क्योंकि मुझे इस चीज का नहीं पता था कि हम लोग सोशल मीडिया पे जाएंगे और मैं जिस फैमिली से ताल्लुक रखती हूं मतलब मेरे भाई हैं एजुकेटेड हैं। अल्लाह का शुक्र है मेरे भांजे हैं एजुकेटेड हैं। लेकिन मेरा ससुराल है वो सारे एजुकेटेड हैं। बट वह इस चीज़ को मतलब बाकियों का तो नहीं पता लेकिन मेरे हस्बैंड नहीं मानते थे कि मतलब Facebook भी मेरे पास Facebook भी नहीं थी। मैंने कोई डाउनलोड नहीं की हुई थी। मैंने मैम असमा से मशवरा किया। मैंने कहा मैम ये चीज उन्होंने कहा तुम्हें तो आना पड़ेगा। ये तो हमारे काम का हिस्सा है। अच्छा मैं काफी दिन सोचती रही कि मैं कैसे करूंगी? मुझे तो नहीं। मैं तो सवाल ही नहीं पैदा होता। ऊपर से पिक्चर भी लगानी पड़ेगी कि नहीं मैं तो कर ही नहीं सकती। अब तो सवाल ही नहीं पैदा होता कि इस स्कूल में मेरा हो सके कुछ भी। फिर मेरे भांजे जो हैं मैं ज्यादातर उनसे मशवरा करती होती हूं। वो तकरीबन मुझसे थोड़ा सा ही छोटे वो भी शादीशुदा हैं। बच्चों वाले तो मैंने अपने एक भांजे को कॉल करके कहा मैंने कहा ये इस तरह से Facebook बनानी है और उस पे आना भी है तो क्या करूं मैं? तो उसने कहा हाला आप कोई गलत काम करने तो नहीं ना आ रही ना? कोई डांस तो नहीं करना। कोई गाना तो नहीं गाना तो ये तो क्या है अच्छे काम के लिए बेशक आओ। अच्छा थोड़ा सा मेरा हौसला बढ़ा। मैंने कहा ठीक है। फिर मैंने हस्बैंड से कहा कि मैंने Facebook उन्होंने कहा सवाल ही नहीं पैदा होता। तुम Facebook नहीं नहीं नहीं तुम तो कर ही नहीं सकती। अच्छा मैंने मैं जो हम लोगों के ज़हनों में होता है ना कि नेगेटिव पॉइंट होते हैं जो मेरे भी ज़हन में वही थे कि अगर मैं Facebook यूज़ करूंगी तो मैं नेगेटिव चीजें भी देखना शुरू हो जाऊंगी। क्योंकि हम लोग बच्चों को जब चीज मोबाइल से ज्यादातर बचाते इसीलिए कि बच्चा कहीं नेगेटिविटी में ना चला जाए। तो मुझे भी यही था कि शायद मैं भी ऐसा ही करूंगी। मेरे हस्बैंड को जाहिर है वो भी ऐसा ही वो तो और भी क्योंकि वो जिस इलाके में अभी रह रहे हैं या काम करते हैं वहां पे तो नेगेटिविटी है। पॉजिटिविटी का कोई सोच भी नहीं सकता। तो मुझे तो यही था। उन्होंने कहा नहीं। जब मेरे भांजे से मेरी बात हुई उसने कहा हाला कोई गलत काम नहीं है। आप अच्छे काम के लिए आओगी। बेशक आओ। तो मेरा हौसला बढ़ा और मैंने अपने हस्बैंड्स के अगेंस्ट जाकर मैंने ये किया। फिर पहले तो मैंने कैनवा पोस्ट अपलोड की। मैं हंसी भी बहुत इस चीज पे कि लोग कहेंगे यार ये क्या चीज है? ये क्या कर रही है और उस पे मुझे इस तरह से लगा जैसे मैंने पता नहीं कौन सा कारनामा अंजाम दे दिया है। जैसे कोई बहुत बड़ी बात मैंने कर दी हो। क्योंकि cवा पोस्ट बनाना मैंने मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैंने पता नहीं क्या बना दिया है। मुझे इतना अच्छा लगा। मुझे इतनी खुशी भी हुई थोड़ा सा मुझे यह भी हुआ कि मुझे आ गया है। मुझे ये हुआ कि मत हां अब मुझे आ गया। मैं कर सकती हूं। मेरा हौसला बढ़ा। आपकी वैसे रेगुलर क्वालिफिकेशन रेगुलर तालीम सर मैंने एफए किया हुआ है। हम कितने साल स्कूल में पढ़ाया? तकरीबन पांच साल। और मुझे ये था कि मैं अब कैनवा पोस्ट तो बना लिया। मैंने बहुत बड़ा कारनामा अंजाम दे दिया है। तो अब तो मैं दूसरे दिन फिर मैं आई तो सॉन्ग पे आ गई। अब सॉन्ग जब मैंने देखा बच्चों को बना मैंने कहा ये तो सवाल ही नहीं पैदा होता कि मैं बना सकूं। नहीं ये नहीं हो सकता। दूसरे दिन भी मैं वैसे ही बैठ के चली गई उनके बच्चों को देखते हुए सोच-सच के कि नहीं मुश्किल है मुझसे नहीं हो पाएगा। मैं नहीं करूंगी। तीसरे दिन कासिम भाई बैठे थे तो उनको मैंने आके कहा। मैंने कहा कासिम भाई मुझे ना बच्चे बना रहे हैं सॉन्ग तो जरा थोड़ा सा आप आईडिया दे दें कैसे बनता है। इन्होंने कहा जैसे आपने देखा है वैसे मुश्किल है। जैसे मैं बताऊंगा आपको शायद आ जाए। मैंने कहा ठीक है बताएं। इन्होंने खैर वही सॉन्ग चैट पिट्टी से बनवाया सुनोई आई पे किया सारा कुछ सारा करके तो मैंने भी वैसे ही किया। मुझे पहली दफा सॉन्ग बनाने में तकरीबन तकरीबन 1 घंटा लगा जो कि मेरे लिए बहुत ही मुश्किल काम था। और जब एक घंटे बाद वो बन गया अब मुझे उसका यह भी नहीं पता था इसके पीछे कैसे जाना है इसको आगे कैसे ले जाना है इसका पेज कैसे लाना है ये चीजें मेरे लिए मुश्किल और अजीब सी थी क्योंकि फर्स्ट टाइम था फिर खैर सॉन्ग भी बना लिया उस पे तो मैंने अपने आप को बहुत ही बड़ी चीज समझ लिया कि भाई मैं तो पता नहीं कहां पहुंच गई हूं। मैंने तो इतना बड़ी कारनामा अंजाम दे दिया है। लेकिन फिर भी था मुझे कि मैंने शायद जाहिर है एक इंसान को अपने अंदर कमी का जो होता है वो तो होता है क्योंकि बच्चे मुझसे काफी आगे थे लेवल में और मुझे लगता था कि नहीं मैं बच्चों तक कभी नहीं पहुंच पाऊंगी क्योंकि बच्चे लेवल में मुझसे बहुत आगे हैं। हर काम यूं कर रहे हैं और मुझसे यूं नहीं हो रहा। मुझसे कैनवा पोस्ट यूं बनने वाली तो सोच ही नहीं है। खैर बंदे बंदे टाइम लग जाता था। खैर फिर अल्लाह का शुक्र है मैंने कर लिया और अल्हम्दुलिल्लाह अल्हम्दुलिल्लाह उस वक्त की साइमा और इस वक्त की साइमा में बहुत फर्क है। उस वक्त की साइमा थी मैं शुरू से ही गुस्से वाली हूं। मैं पता नहीं बदतमीज हूं या क्या हूं। जो कह सकते हैं आप मुझसे मुनाफकत नहीं होती। बोलती मैं मुंह पे हूं। झूठ मुझसे बर्दाश्त नहीं है। गुस्सा मुझे बहुत आता है। चिढ़ती मैं बहुत ज्यादा हूं। शायद हालात की वजह से ऐसी हो गई हूं या शायद। हालांकि मैं शुरू से ही मतलब हंसी मजाक इन चीजों को पसंद भी करती हूं और खुद भी करती हूं। मैं हर एक के साथ फ्रेंडली मतलब मुझे ये चीज पसंद ही नहीं है कि मुंह बना के बैठा रहे बंदा और साइड पे और ये वो नहीं। खैर बहरहाल मुझे एक साल तो हो गया है और बल्कि एक साल से भी ज्यादा हो गया है। मुझे बहुत मजा आया सारा कुछ सीखने में। मुझे इतना अच्छा लगा है के इंसान की एक शख्सियत होती है। मुझे यहां आ के पता चला है कि मेरी भी एक जात है। मेरी भी जात एक मायने रखती है। उसमें भी उसको भी वैल्यू होनी चाहिए। मतलब मुझे नहीं था। उससे पहले बस एक बीवी, एक बच्चों की मां बस या कमीशी में जाने वाली एक औरत जैसे आम होती हैं घर की। लेकिन अब मुझे लगा कि मेरी एक पर्सनालिटी है। मेरी एक शख्सियत है। मेरी मेरे अंदर कुछ है कि मैं मुझे भी इज्जत की जरूरत है। मुझे भी वैल्यू चाहिए। हर बंदा मुझे भी अहमियत दे कि भाई कोई आया है या कुछ। अल्हम्दुलिल्लाह मेरे ससुराल में वालों ने मुझे देखा जब जिनजिन ने देखा उन्होंने बहुत एप्रिशिएट किया रिस्पेक्ट दी पहले नहीं करते थे पहले भी करते थे अल्हम्दुलिल्लाह लेकिन वो उनको ये नहीं पता था मतलब जाहिर है एक सोशल मीडिया पे आना मेरा मुझे सोशल मीडिया पे आके ऐसे बैठना या लाइव जाना ये एक मेरे लिए नई चीज थी और मेरे ससुराल वालों को भी मुझे देखने में एक नई चीज ही लगी है जाहिर है तो फर्स्ट टाइम जब मैंने कॉल एनी की तो मुझे नहीं पता था यह 25 मिनट की करनी है। फर्स्ट टाइम मैंने कॉल एनी की और तकरीबन 10 या 15 मिनट की की तो मुझे इतनी झिझक हुई मैंने कहा नहीं मैं ये मुश्किल काम है मैं नहीं कर सकती और मुझे कोफ्त होती थी कि मुझे ये कोई ना कहे कि कॉल नहीं करनी है। फिर मैंने दूसरे दिन भी तीन-चार दिन गुजरे तो हमारे साथ एक फैसिलिटेटर होती थी शाहिदा नाम था उनका। उन्होंने मुझे कहा कि वो खड़ी थी मैं उस्मा के पास तो पता नहीं मैं उस्मा से मैंने कोई कॉलनी के सिलसिले में बात की तो मुझे वो हंस के कहने लगी कि आपका क्या है आपने कौन सा 25 मिनट की करनी होती है 10 12 मिनट की करती हैं आप मैंने कहा क्या मतलब तो मैम उसमा ने कहा कि वो 25 मिनट की होती है मैंने कहा यार मुझे गाइड तो करें मुझे नहीं पता कि 25 मिनट की करते हैं फिर मैंने 25 मिनट बल्कि मैं 40 मिनट तक भी जाती रही हूं फिर मुझे एंजॉय एंजॉयमेंट होने शुरू शुरू हो गई थी उसमें कि मतलब वो बोल रही है मैं सुन रही हूं मैं मुझे भी होता था कि बाज वक्त मैं ऐसा करती थी कि मैं लाइव नहीं जा रही लेकिन मैं बंद करके उससे बातें करती थी के एक्सीडेंट भी ठीक हो वो जैसे बातें कर रही है मुझे भी ऐसी करनी है मैं उससे फिर अपने बारे में पूछती थी फिर मैं उससे उर्दू में भी अपने बारे में पूछती थी कि मुझे मतलब जाहिर है एंजॉय भी किया मैंने सीखा भी बहुत कुछ है। सबसे मेन चीज जो सीखी है मैंने कि मैं मेरा कॉन्फिडेंस इतना बिल्ट हुआ है ना कि अगर मैं अब कहीं भी चली जाऊं मुझे यह नहीं होता कि मैं बात नहीं कर सकूंगी, मैं बैठ नहीं सकूंगी या फला बंदे के सामने नहीं सवाल ही नहीं पैदा होता। इसके ये तो बड़ी हस्ती है। इसके सामने तो मैं बैठ ही नहीं सकती। बात ही नहीं कर सकती। अब मैं हग करती हूं। अब मैं आगे चली गई हूं। मुझे जहां तक लगता है और इंशाल्लाह इंशाल्लाह मैं आगे मजीद जाऊंगी। इंशा्लाह मेरा इरादा यहीं पे है कि मैं इसी से बहुत कुछ सीख के आगे जाऊं। क्योंकि बच्चे भी सीख रहे हैं। बच्चे बहुत आगे चले गए। माशा्लाह माशा्लाह इन बच्चों को देख के एक खुद एतमादी आती है। एक प्राउड फील होता है क्योंकि मेरे जो अपने बच्चे हैं वो स्कूलिंग कर रहे हैं। मेरा बड़ा बच्चा है उसको मैं नहीं समझती कि वो इस लेवल पे है कि वो बात कर सके किसी के साथ। तो अल्हम्दुलिल्लाह मुझे यहां के बच्चों को देख के बहुत खुशी होती है। अल्लाह का शुक्र है बच्चे भी काफी आगे हैं। हम लोग भी हैं। मैंने तो इतना कुछ सीखा है कि मतलब मुझे सॉफ्टवेयर का नहीं पता था। वो चलाना आ गया। उस पे मैं फी एंट्री कैसे करते हैं और शीट्स कैसे बनती हैं? मतलब बहुत कुछ सीखा है। सॉफ्टवेयर बनाना नहीं सीखा अभी। नहीं वो नहीं सीखा। तो एक सीख ले कोडिंग बुक वन तो बहुत आसान है। बुक वन तो मैंने कर ली। तो मुझे नहीं सीखा। मतलब वो वाला वो वाला नहीं आया ना जैसे मैं खुद से एक गेम बनाऊं। जैसे मैं खुद से एक वेबसाइट बनाऊं। बुक वन की है। उस पे तो एक बच्ची ने पता नहीं कितने अवार्ड ले लिए हैं। एक बुक वन पे। नहीं बुक वन तो मैंने कर लिया। अच्छा उस वक्त मुझे बड़ा शौक था जब मैंने बुक वन स्टार्ट की थी उस वक्त मैंने एसीसीएल स्टार्ट की थी। मैंने टीचर ट्रेनिंग स्टार्ट नहीं की थी। एसीसीएल पे जब मैं स्टार्ट लिया तो वो चीजें बनाना शुरू की तकरीबन 12-15 पेजेस में कर चुकी थी। उसमें जब कोडिंग का आया तो मुझे थोड़ा सा मुश्किल लगा कि शायद मैं कर नहीं पाऊंगी। क्या चीज है? जब मैंने वो बनाया एक बन गई ना तो वो मुझे अजीब सा वो फील होना शुरू हो गया। मैंने सारी बनाना शुरू कर दी। तो फिर उसके 25 टास्क थे। वो मैंने फिर दो-तीन दिन में कर लिए सारे। फिर एक बच्चों ने बताया था उसमें था कोड पिन उससे कैसे बनता है? तो फिर मैंने उस पे भी बनाए मतलब वो मुझे बड़ा मजा आया था उस पे बनाते हुए। तो अगर कोई आपसे पूछे कि इस स्कूल का जो बच्चा है जो उसने एक साल अभी तक तो यहां पे सिर्फ ऐसे ही बच्चे हैं जो सिर्फ एक साल पढ़ाते हैं। तो उस एक साल में आप में भी बहुत फर्क आया उन बच्चों में भी आया और एक रेगुलर स्कूल में हम आपने भी मैट्रिक किया एंटर किया 10 साल 15 12 साल बच्चा उधर से निकलता है और जो निकलता है वो बस पता नहीं बस वो मजाक ही निकलता है तो मेरे ख्याल से यहां से जो 10 12 साल में निकलेगा आपको क्या लगता है वो क्या चीज होगी यहां से 10 12 साल में बच्चा निकलेगा तो वो एक बहुत बड़ी चीज बनके निकलेगा उसकी वजह ये है कि जो स्कूलिंग में हम जैसे जैसे ट्रेडिशनल स्कूल में हम बच्चे को पढ़ाते हैं। उसमें वो बच्चा जो है उसका कॉन्फिडेंस यूं हो जाता है। यहां नहीं जाता। उसकी वजह ये है कि उनको मारा उनको पीटा जाता है। उनको बार-बार हर बात पे जलील किया जाता है। हम लोग उनको आगे जाने ही नहीं दे रहे खुद। तो यहां पे सबसे मेन चीज जो यह है कि एक तो है कि प्यार। हम लोग बहुत प्यार से बच्चों के साथ रहते हैं। मतलब यहां पर यह चीज नहीं है कि मैंने डंडा उठाया, मारा, थप्पड़ मारा, बाल खींचे, यह किया, वो किया। नहीं है। सबसे पहली चीज है यहां पे बच्चे हमारे साथ बिल्कुल एज अ फ्रेंड रह रहे हैं। उन्होंने हमें अच्छे से वो किया हुआ है। जब वो यहां पे रह के जाएंगे तो इंशाल्लाह वो उनके अपने बिजनेस स्टार्टअप होंगे। उनको अपना बिजनेस का पता होगा कि हमने कौन सा बिजनेस करना है और बल्कि वो आधा-आधा अपना बिजनेस जो है मुझे जहां तक लगता है कि अगर वो यहीं पे रहे 10 12 साल तो वो अपना बिजनेस एक बहुत बड़ा खड़ा कर चुके होंगे जिसकी बुनियाद पे वो यहां से निकलेंगे भी ना तो उनको यह खतरा नहीं होगा कि अब जाके हम क्या करें वो ऑनलाइन घर बैठ के अरबों रुपए कमाएंगे इंशाल्लाह क्योंकि यहां के बच्चों में अभी जो अभी बच्चों ने अर्निंग स्टार्ट की है जो इनको हम लोग दे रहे हैं इंटर्नशिप दे रहे हैं। तो माशा्लाह से बच्चे बहुत अच्छा से अच्छे से कर रहे हैं। और वो जब हम लोग छोटे से बड़े की तरफ जाते हैं तो फिर तो बच्चा एक बहुत बड़े हाई लेवल पे चला जाएगा। एजेस भी उनकी कम होंगी और उन्होंने सीखा हुआ भी बहुत कुछ होगा। उनके पास इतना कुछ होगा कि आगे देने के लिए भी उनके पास बहुत कुछ है। मतलब वह सिखा भी सकते हैं। वह अपनी मतलब वह इसी चीज से अर्न करेंगे। वह अपना बिजनेस करेंगे। वो अपने बिजनेस को बहुत ग्रो ग्रो अप करेंगे। उसकी वजह यह है कि बच्चे माशा्लाह माशा्लाह यहां पे इतना एक सबसे जब हमारा एक टूर होता है ना जितना कॉन्फिडेंस लेवल बच्चों का टूर करवाते हुए बिल्ट होता है। अ इतना मेरे ख्याल से किसी किसी काम में भी नहीं। क्योंकि जब हमारे आम स्कूल में ट्रेडिशनल स्कूल में आप चले जाएं वहां पे तो ना टूअर होता है। वहां पे तो बस बच्चा आया एडमिशन हुआ बात खत्म। पेरेंट्स को इनवॉल्व होने की जरूरत ही नहीं पड़ती। ना कोई करता है। यहां पे हम पेरेंट्स को भी साथ ले आते हैं। पेरेंट्स का भी मतलब हमारे साथ जितने भी पेरेंट्स हैं अल्हम्दुलिल्लाह ये ऐसे पेरेंट्स थे मेरी तरह जो सोशल मीडिया जिन्होंने कभी यूज़ ही नहीं किया ना उस पे आना पसंद करते थे। लेकिन अल्हम्दुलिल्लाह अब ऐसा है कि काफी पेरेंट्स अवेयर हो चुके हैं और यहां आ के आने के बाद तो वो इतने मुतमन हो जाते हैं दो चार क्लासेस भी बच्चों की अगर लें या अटेंड करें उनके साथ तो उनको बड़ा मजा आता है और उनको हर चीज का पता चलता है अली बे का भी कि ये बच्चे कर क्या रहे हैं क्यों कर रहे हैं उनको खुद भी करने का फिर होता है तो तो मैं अगर मैं आपसे एक क्वेश्चन पूछ लूं इस दौरान तो हमारे स्कूल का टारगेट है कि एट लेवल के आप क्रॉस नहीं कर सकते। यानी ग्रेजुएशन नहीं हम देंगे आपको। आपको अपने पास ही बैठा के देंगे जब तक आपके बैंक में 28 करोड़ ना हो। आपको लगता है ये पॉसिबल है? सर यहां तो मुझे लगता है पॉसिबल है क्योंकि बच्चों को इतना कुछ सिखाया जाता है। इतना उनके उनको एक इल्म दिया जा रहा है कि मेरे ख्याल से मुमकिन है। पहले मेरे ख्याल से कभी नामुमकिन होता। अगर मैं ट्रेडिशनल स्कूल में ही आज होती तो मेरे ख्याल से मेरे लिए भी ये नामुमकिन था। सोचना या करना? सोचना भी करना तो बहुत दूर की बात है। सोचना भी नामुमकिन था। अब 28 करोड़ जो है एक पाकिस्तानी अपनी सारी जिंदगी में नहीं कमा सकता। कभी नहीं। एक घर भी बड़ी मुश्किल से बहुत मुश्किल से करोड़ का। ऐसा ही है। मैं कहता हूं 28 करोड़ सर। इंशाल्लाह इंशाल्लाह आपका ये ख्वाब भी पूरा होगा। मुझे तो पता है लेकिन आपको यकीन हुआ या नहीं हुआ? मुझे बिल्कुल हो गया है। मुझे तो मैं आपको बता रही हूं कि मुझे बहुत मजा आता है। अब मतलब मुझे घर में मेरे बच्चे हैं और उनको मैं स्कूल भेज के फिर आती हूं। और बाजात मुझे इतनी जल्दी होती है स्कूल आने की कि मैं बच्चों को घर पे ही छोड़ के आ जाती हूं कि आपने स्कूल चले जाना है। तो उनको मैं जा रही हूं। इतना अच्छा है। सर मेरा ट्रांसपोर्ट का इशू है। क्योंकि मैं बाजकात बाइक पे आती हूं। बाजकात गाड़ी करवा के अब जाते हुए डेली मुझे गाड़ी करवानी पड़ती है। तो उनको ऑनलाइन में क्यों नहीं जा? या सर मेरे घर नेट का भी इशू है। मैं रेंट पे रहती हूं। इधर-उधर इधर-उधर जाना फिर वो मेरे लिए पॉसिबल नहीं है। फाइनशियल प्रॉब्लम की वजह से बच्चे नहीं डालते। जी ऐसा ही है। ठीक है। आप कुछ सवाल करना चाहते हैं? सर मैं ये सवाल करना चाह रही थी कि पहले तो आप मुझे बताएं कि आपकी एजुकेशन कितनी है? मेरी मैं सेवंथ फेल हूं। सर ना करें ना। मैं सेवंथ फेल हूं। तो फिर आपको ये ये कैसे आईडिया आया आपके ज़हन में? फिर आपने स्कूल बनाया एकदम से वो सारा मतलब क्या था आप मेरे बारे में मेरी डॉक्यूमेंट्री 2ाई घंटे की देखी है कभी नहीं मैं आपकी देखती हूं लेकिन मैं बहुत कम देख है पूरी डॉक्यूमेंट्री है जिंदगी की 2ाई घंटे की देख नहीं वो नहीं देखी पहले वो देखें फिर इंटरव्यू करें क्योंकि उसमें से आपको 99% जवाब मिल जाएंगे वो जरूर देखनी चाहिए आपको यहां पे एक साल से तो आसमा को शुरू में ही दिखानी चाहिए थी और मेरे तारुफ में वो लिंक होता है कि मेरी ये 3 मिनट की डॉक्यूमेंट्री है ये 15 मिनट की अच्छा सर वो मैं आपके देखती हूं लेकिन वही बात है कि वो वो वाली डॉक्यूमेंट्री नहीं देखी हां वो मैंने नहीं देखी अभी तक तो जब तक नहीं देखेंगी मुश्किल है समझना क्योंकि ये लंबा कहानी है ना क्योंकि हमारे मुझे ये था ना कि हमारे इलाके में कोई भी नहीं है इस तरह का स्कूल ना इस्लामाबाद में है मेरी बहन पूरी दुनिया में कोई स्कूल नहीं है तो वो यहां पे मुझे जब खुद मैं जब आई हूं बीच में घुसी हूं पता चला ये क्या हो रहा है क्या बच्चे क्या कर रहे हैं क्यों कर रहे हैं तब मुझे लगा कि मैं आपसे ये क्वेश्चन आप मुझे मिले तो पूछूंगी कि ये क्या है ये कैसे आपने कि भाई बच्चा भी सीखेगा और इधर आगे इतने लेवल तक जाएगा क्यों नहीं जा सकता सर हमारे लोग तो किताबों से बाहर निकले तो कुछ सोचें तो मैंने तो किताबें पढ़ी नहीं है ना इसलिए मैं निकल गया जो लोग मतलब ये है ना ट्रेडिशनल स्कूल में पढ़े हैं जैसे मैं खुद भी हूं मैं नहीं समझती कि मुझे बात करने का अभी भी तरीका सही है मेरा या मुझे बात करनी आती है हम लेकिन मुझे नहीं पता कि मेरे मेरी सोच में यह नहीं था सब कुछ किसी की भी सोच के ऐसा स्कूल भी हुआ होगा या ऐसा स्कूल भी होगा जिसमें बच्चे लैपटॉप हां या लैपटॉप के ऊपर बच्चे काम करेंगे या आगे जाएंगे ये मेरे लिए एक नई चीज और बहुत अच्छी चीज है मुझे मजा आया बहुत करके चलिए तो आप जो लोग इसको देख रहे हैं उनको अपनी तरफ से दावत दें कि वो जो इस्लामाबाद के दासी हैं वो आके स्कूल देखें तो सही और एक दफा देखने से समझ में नहीं आता बच्चों से मिलेंगे बातें करेंगे तो ऐसे ही है बिल्कुल दावत है हमको जी व्यूअर्स मैं आप सबसे जितने भी लोग मुझे इस वक्त देख रहे हैं उन सब से मेरी रिक्वेस्ट है कि प्लीज आ विजिट करें इस्लामाबाद कैंपस का यह इस्लामाबाद कैंपस बाराको में है मेन सिमली डैम रोड से आप सिरी चौक की तरफ आ दानियाल चौक से इंटर हो के यह हमारा स्कूल है रिहान स्कूल इस्लामाबाद कैंपस आप प्लीज आ विजिट करें अपने बच्चों को भी साथ लाएं और हमारे स्कूल का विजिट करके हमारे स्कूल का टूर करके उसके बाद आप अपने बच्चों को कोशिश करके यहां पर लाएं क्योंकि मैं बहुत खुश हुई हूं यहां आ के मैंने बहुत कुछ सीखा है। तो आप सबसे मेरी रिक्वेस्ट है कि एक बार जरूर आए आप लोग।
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